काव्यगगन( kavyagagan)

जब जब छलके अंतरमन,भावोंं की हो गुंजन,शब्द घटाओं से उमड़ घुमड़, रचते निर्मल ...'काव्यगगन'! यह रेणु आहूजा द्वारा लिखा गया ब्लाग है .जो कि उनकि निजि कवितओं का संग्र्ह है!it is a non profitable hobby oriented blog.containing collection of hindi poetries.

Friday, April 28, 2006

बेचारा अमीर

आदत पड़ गई गरीब को बिन पैसे के रहने की
क्या करे अमीर बेचारा बिन पैसे रह पाए नहीं!

Tuesday, April 25, 2006

नेह का वरण करो

सत्य कटु पर कभी कभी मात्र गरल होता है
असीम वेदना का कभी परीक्षा स्थल होता है,

झूठ सही पर कभी कभी मरहम भी बन जाता है,
शब्द सामर्थ्य कभी अलंकरण वाणी का बन पाता है,

है सहनी पड़ती पौरुष को भी कटु शब्दों की धार
कि मृदु सौमय को भीरु, दीन, समझे न हर बार.

कोप भवन की वेदी सीमा गगन क्षितिज सी अनंत
ताप्त गगन को भी चाहिये, शीतलता चंद सम

देता भले ही तपते कुंड़ को जग, होम-आहूती
पर शांत भस्म ही बन पाये तिलक शीर्ष भभूती

गौरव दर्प पौरुष का, बन दमके तीखा ताप
पर एक बूंद स्वाति-कण की, मिटा देती संताप

भले जगत मे, जीवन-रण में रौद्र रूप धरो
पर हृदय के अंतर-तल में वरण नेह का करो.
-रेणु आहूजा.

Monday, April 17, 2006

अगर मेरे शब्द दिल में उतर जाएं...

अगर मेरे शब्द
दिल में उतर जाएं,
अपने वोटो से इसे जताएं,
यूं ही बस दिल आया
नाम प्रतियोगिता की
श्रेणी मे लिखवाया
हम तो भावनाओं का
आकाश बना देते हैं,
पसंद जिन्हें है-'काव्यगगन'
वो वोटों से बता देते हैं!!
-रेणु.

Saturday, April 08, 2006

ताजमहल




प्यार के निशां भि होते है अजब,
न कोई शीकन मगर दिल में दर्द

सुना करते हैं कि मुहब्बत थी बेपनाह
दिलशाद दो दिल, मुमताज़ - शाहजहां

कौन जाने मुमताज़ कितने दर्द पी गई
अदब से बंधी अपने होंठ सी गई

इल्म जब हुआ एक खावींद को
तो शायद एक निशानी ताजमहल बन गई!
-रेणु


निशां

२.प्यार ही नहीं अमीरी का भी निशां है ताजमहल,
ये बात और है कि प्यार तो मुफ़िलस भी किया करते है!
-रेणु
ये पंक्तियां निम्न जालाधार पर भी पर्काशित हो चुकी है
\http://www.geocities.com/muktaksaagar/

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