तुम

राधे कृष्णा से कहने लगी एक दिन
कैसे दिल में उतर कर चले आए तुम
पहले अपनें में रहती थी खोई हुई
अब तेरे ख्यालों में रहती हूं गुम
इस दिल का ये आलम कैसे कहूं
मुझ को मुझी से चुरा लाए तुम
अधिकारों का मैने किया था वरण
कर्तव्यों की भूमि पर ले आए तुम
अनजाना सा मैनें था समझा तुम्हें
मुझे अपना बना कर चले आए तुम
पहले मुश्किल थी राहें लगती बड़ी
मुशकिलों को ही राहें बना लाए तुम
कृष्णा कृष्णा थी राधा रटती कभी,
कृष्णा राधे में अंतर हुआ कैसे गुम
समर्पण हो मन का इस तरह
'मैं' ना रहे ना ही रह जाए' तुम'
-रेणू
5 Comments:
रेणू जी,
बहुत सुंदर कविता है । विशेष कर यह दो लाइने ।
अधिकारों का मैने किया था वरण
कर्तव्यों की भूमि पर ले आए तुम
बधाई !!!
रीतेश गुप्ता
बहुत ही सुन्दर रचना है, रेणु जी.
मुझे याद है, ऐसे ही कुछ भाव मेरी एक 10 साल पहले लिखी कविता मे थे.
यदि मेरी डायरी मे कहिं मिली तो अपने ब्लाग मे लिखुँगा..
kabitane mughd kar diya renu ji
bdhayi
रीतेश जी, राही जी, और ज़ालिम जी,
आप सबने 'तुम' के काव्यभाव को पसंद किया , यह आप सबकी भावों को गहराई से समझ पाने का परिणाम है,
मेरी सदैव लेखनी अपना काव्यधर्म निभाती रहे यही सतत प्रयास है, और आप सब अपनी आलोचनाओं और विवेचन से अवगत करवाते रहें यह अनुरोध है!
धन्यवाद.
-रेणू
bahut khoob!
sat pal khyaal
aajkeeghazal.blogspot.com
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