'प्रेम'

गोपी भेंट उद्धव जब आए
सहज ग्यान भंड़ार थे वो
विरह अग्नि की शांति मात्र के
सुलभ साधन मात्र थे वो
कृष्णसखा ने यही सोच कर
भेजा था उद्धव को ही
ग्यान ध्यान से जीत न पाए
कदाचित प्रेम दावानल भी
पर हुई उल्टी ही परिभाषा
भई विजित नेह सरिता
जड़ चेतन में, कण कण में
हर अश्रु और हर नयन में
राधा संग हर गोपी मन में
वाणी के शब्दों से आगे
चक्षु नीर की हदों से आगे
एक समर्पण छाया था
नतमस्तक हो गया ग्यान भी
छवी उभरी कृष्ण मुरारी की
मूक बधिर हुआ ग्यान सिंधु तब
अवचेतन मन हुआ प्रबुद्ध तब
न कोई 'मैं' थी , न कोई' वो' था
न कोई 'अहं' , न ही 'संशय' था
अर्पण समर्पण से सिक्त हुआ सा
सात्विक प्रेम का स्वर्णिम क्षण था
यही प्रेम की संचित भाषा,
यही नेह की अथाह परिभाषा
ग्यान विग्यान दर्शन भी सफ़ल तब
रहे नेह में निष्ठा जब तक.!!!
-रेणू आहूजा.
16 Comments:
रेणू जी,
बहुत सुदंर और भावपूर्ण कविता है ।
कुछ अच्छे शब्द सीखने को भी मिले ।
बधाई !!
रीतेश गुप्ता
शुक्रिया रीतेश,
प्रयास रहेगा कि भविष्य में भी भावाभिव्क्ति में सफ़ल रहूं और कविधर्म का पालन कर सकूं
-रेणू.
पहले की राधा अपनी एकनिष्ठता की रक्षा के लिए उद्धव के ज्ञानमार्ग को धता बताती हुई उनसे कहती थी " ऊधौ मन नाहीं दस-बीस,एक हुतो सो गयो स्याम संग को आराधै ईस।" (सौजन्य:सूरदास)
आज की राधा होती तो उद्धव प्राण बचा कर भागते और वह कहती "ऊधौ मन मांहीं दस-बीस,एक हुतो सो गयो स्याम संग बाकी बचे उन्नीस ।" (सौजन्य:दिव्यदृष्टि दास)
ऊधौ भागते नहीं तो क्या करते .
excellent poem describing love and emotions, your grasp and use of words are amazing.
renu ji,
gyan aur bhakti ki kashmakash main bhakti ki shreshtha ke adbhut prasang par aapki lavanyamaya drishti dil ko choo lene wali hai. ati uttam.
preshit chitra bhi kavya ko gaharai dene wala hai. kripya isi taraha kavita ke saath chitra bhi preshit karti rahen.
-- Punit Pandey
HindiBlogs.com
बहुत खुबसूरती से इसे सजाया है आपने, बधाई.
nice one.....
Prem shbd hi apne sath bahut vichar lata hai and u had used words in a very good way.
Congrates and thanx for sharing
Renu ji
Bahut ache aapke man ke vicharon ki abhivayakti hai, prem ke sunder roop ka varnan kiya hai,aap aur bhi acha likhe yehi dua hai
xyz
प्रिय रेणुजी,
आपने ब्लोग बडा सुँदर सजाया है -- कविताएँ भी मोहक हैँ ~~ बधाई !
सादर स~ स्नेह,
लावण्याh
सुन्दर कविता है...
मैने हाल ही में पूरा भ्रमर गीत प्रसंग सुना था(आडियो), अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग है
Ab sab badhayi kar rahe hain to sunder aur bhavpurna hi hogi. Par main bavala bas kahin kahin tuk milta sa paa paaya aur adhiktak pravah ronkate shbd mile, haan gyan aur prem ka kuch dvandv sa milaa.
kavita bahut sundar hai. vishesh roop see ye pankiyaan
" न कोई 'मैं' थी , न कोई' वो' था
न कोई 'अहं' , न ही 'संशय' था
अर्पण समर्पण से सिक्त हुआ सा
सात्विक प्रेम का स्वर्णिम क्षण था "
acchi lagi .
Likhte rahiye
neerav.
रेणू जी आज पहली बार आपके ब्लोग पेर आई हूँ,मगर अफ़सोस हो रहा है पहले क्यूँ ना पढ़ पाई...वाकई आपकी कविता बेहद खूबसूरत मनमोहक है...
बहुत-बहुत बधाई
सुनीता(शानू)
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld
thanks renu ji jitni sunder aap hai utni sunder aapki kavita hai.
प्रियंकर जी:- आज की राधा होती तब ना.....); !!
आलोक जी,पूनीत जी, समीर जी (उड़्नतशतरी),तेजवर्ल्ड़,अग्यात जी, लावण्या जी(अंतरमन), नितिन जी,उपस्थित जी, कमलेश जी, नितिन जी एवं सोनू जी,
आप सब गुणी जनों की सराहना से काव्य लेखन सफ़ल हुआ , एसा मानती हूं. संसार के हर जीव के मन ये भाव है इस शाशवत सत्य को छूने का प्रयास ही यह कविता थी !
सादर
-रेणू.
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