बैंगन (हास्य व्यंग्य कविता)

बात तब की है,
जब सुबह के पांच बजे थे
हम अभी अभी ब्रश करके हटे थे,
कि हमारी परम पूज्य माता जी ने आवाज़ लगाई
मैं एक आग्याकारिणी की भांति उनके पास चली आई
"आज बैंगन बनेंगे " ये आदेश दे कर वे चली गईं
इस आपात कालीन सूचना की खबर पाकर
हम ठगे से रह गए वहीं के वहीं
अभी हम भून ही रहे थे बैंगनों को
कि एक दर्द भरी आवाज़ आई " हमें बचा लो "
हम बैंगन नहीं , हम हैं अफ़्रीका के अशेवत
यहां आग में भूने जा रहे हैंवहां गोलियों से भूनते हैं हमें शवेत
इंसान , इंसान के ही हाथों ख़त्म होता जा रहा है ,
विश्व आज शीत युद्ध में भस्म होता जा रहा है,
आओ लड़ें मिल कर एक अनोखी जंग
जिसका रवैया कर दे हम सबको एक रंग
यही कहते थे मेरे मासूम बैंगन.
मेरे मासूम बैंगन.
... रेणू.
(यह कविता कई गोष्ठियों में सुनी जा चुकी है, और प्रशंसित हो चुकी है, साथ ही काव्यप्रतियोगिता मे प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है.)